Monday, 14 January 2019

किसके इशारे पर ट्रांसफर होंगे दलित वोट, मायावती के बाद कौन?

लोकसभा चुनाव: मायावती ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने दलित राजनीति को एक मुकाम दिलाया, उसे सत्तासीन कराया. ऐसा नहीं है कि देश की राजनीति में उनसे पहले अनुसूचित जाति का कोई नेता सत्ता की सीढ़ी न चढ़ा हो, लेकिन मायावती इसलिए अलग हैं क्योंकि दलितों की राजनीति करने वाले दल बहुजन समाज पार्टी की नेता के तौर पर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य की चार बार मुख्यमंत्री बनीं. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों में भी उन्हें गिना गया. लेकिन 2012 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को मिली कड़ी शिकस्त के बाद पार्टी को नेतृत्व के स्तर पर नुकसान उठाना पड़ा. इस दौरान पार्टी के कई कद्दावर नेताओं ने पार्टी छोड़ी या पार्टी में उभर रहे युवा नेताओं से मायावती ने खुद ही दूरी बना ली स्वामी प्रसाद मौर्या और नसीमुद्दीन सिद्दिकी, ये ऐसे नाम हैं जो बहुजन समाज पार्टी में दूसरी कतार के नेता माने जाते थे. कहा जाता है कि पार्टी में मायावती के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य का स्थान आता था, लेकिन यूपी विधानसभा चुनावों के पहले उनकी राह बसपा से जुदा हो गई. स्वामी प्रसाद मौर्य ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. उनके बाद नसीमुद्दीन सिद्दिकी भी पार्टी से अलग हो कांग्रेस में चले गए. नसीमुद्दीन ऐसी कड़ी के रूप जाने जाते थे जो मुस्लिमों को पार्टी से जोड़ने का काम करता था. बसपा में यह एक सिलसिल है जो जारी है उत्तर भारत के हिंदी पट्टी में कांशीराम ने दलित राजनीति का आधार तैयार किया और बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. नेतृत्व क्षमता और सियासी संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने मायावती को आगे बढ़ाया. मायावती ने कड़ी मेहनत और राजनीतिक सूझबूझ से बसपा को सत्ता तक पहुंचाया. उनकी अपनी राजनीतिक ताकत ही है कि जब भी सियासी गलियारे में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की चर्चा होती है, उनमें मायावती का नाम भी लिया जाता है. मायावती आज अपना 63वां जन्मदिन मना रही हैं और पहली बार उनकी पार्टी गठबंधन में चुनाव लड़ने जा रही है. पर सवाल है कि मायावती के बाद कौन? कौन होगा जो उनकी राजनीति को आगे ले जाएगा? कांग्रेस में शामिल होने से पहले बसपा की राय सोशल मीडिया और टेलिविजन चैलनों पर रखने वाले देवाशीष जरारिया से भी पार्टी ने दूरी बना ली. बसपा ने बयान जारी कर देवाशीष जरारिया के पार्टी से किसी तरह के रिश्ते को खारिज कर दिया. जारी एक बयान में बसपा की तरफ से कहा गया कि देवाशीष जरारिया द्वारा ‘बीएसपी यूथ’ के नाम से फर्जी और अनाधिकृत रूप से चलाए जा रहे संगठन से बसपा के लोगों, खासतौर से युवाओं को सावधान रहने की जरूरत है.’पार्टी या उससे इतर उभर रहे दलित युवा चेहरों से भी वह दूरी बनाती हुईं दिखती हैं. जेल से रिहा होने के बाद मायावती को लेकर किए गए सवाल पर भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने कहा था कि, ‘वह मेरे परिवार की सदस्य हैं. मेरी बुआ हैं. मैं उनका भतीजा हूं. हमारा उनका पारिवारिक रिश्ता है.’ चंद्रशेखर के इस बयान पर फौरन एक दिन बाद मायावती का बयान आ गया और उन्होंने चंद्रशेखर के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया. मायावती ने बयान जारी कर कह दिया, ‘कुछ लोग राजनीतिक स्वार्थ में तो कुछ अपने बचाव में मेरे साथ कभी भाई-बहन का, तो कभी बुआ-भतीजे का रिश्ता बता रहे हैं. सहारनपुर कांड में अभी- अभी रिहा किया गया व्यक्ति भी मुझे अपनी बुआ बता रहा है. मेरा ऐसे लोगों से कोई रिश्ता नहीं है.’देवाशीष जरारिया को इससे धक्का लगा और वह कांग्रेस में शामिल हो गए. मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले देवाशीष जरारिया ने aajtak.in से बातचीत में कहा, 'युवा नेताओं से मायावती की दूरी समझ से परे है. उन्होंने पिछले दिनों बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जय प्रकाश को पार्टी से निकाल दिया. जो युवा नेता पार्टी में सक्रिय होता उसे बाहर निकाल दिया जाता है. मैं सोशल मीडिया के जरिये बहुजन समाज के युवाओं को पार्टी से जोड़ने की मुहिम में जुटा हुआ था, लेकिन यह उन्हें पसंद नहीं आया. इससे बसपा को ही नुकसान हुआ है.'उत्तर प्रदेश के 2012 और 2017 के दो विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनाव 2014 में हार के बाद मायावती के साथ बसपा के अस्तित्व पर सवाल उठने लगे. 2007 के विधानसभा चुनावों में 206 सीटों पर चुनाव जीतकर बहुमत की सरकार बनाने वाली मायावती 2012 में 80 सीटों पर सिमट गईं. 2017 की स्थिति तो और खराब हो गई और बसपा विधानसभा की मात्र 19 सीटें ही जीत पाई. 2014 के लोकसभा चुनावों में 4 प्रतिशत का सम्मानजनक वोट शेयर हासिल करने के बावजूद बसपा इसे जीत वाली सीटों में तब्दील नहीं कर पाई. देवाशीष जरारिया दावा करते हैं, ‘युवाओं और सोशल मीडिया से दूरी का बसपा को नुकसान हुआ. 2013 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में बसपा के चार विधायक जीते थे, लेकिन 2018 में यह संख्या घटकर 2 हो गई. 2013 के चुनाव में मुरैना में बसपा को 31 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन 2018 में यह घटकर 19 फीसदी पर पहुंच गया.’ इसके लिए उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में युवा कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा. वह कहते हैं, ‘नए दलित चेहरों को वह चुनौती मानती हैं, इसलिए वह उनसे दूरी बनाकर रखती हैं चाहें वह चंद्रशेखर आजाद हों, जिग्नेश मेवानी हों.’

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