Sunday, 10 June 2018

पूर्व राष्ट्रपति राजनीतिक करियर की चिंता में बेहतरीन मौका गंवा गए


पूर्व राष्ट्रपति राजनीतिक करियर की चिंता में बेहतरीन मौका गंवा गए

भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब गुरुवार 7 जून को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मंच पर पहुंचे तब मुझे इस बात की पूरी उम्मीद थी कि वे ब्रिटिश इतिहासकार एजीपी टेलर के उस कथन को सच साबित कर देंगें जिसमें टेलर ने कहा था, ‘एक राजनेता मंच के ऊपर या मंच पर जाकर प्रदर्शन करता है, लेकिन एक इतिहासकार मंच के सजे दृश्यों के भुलावे में नहीं आता है और उसमें छिपे गहन अर्थों को समझने की कोशिश करता है.
चूंकि, ऐसा नहीं होना था तो नहीं हुआ. मुखर्जी जो कि अपने शुरुआती दिनों में एक स्कूल टीचर रह चुके हैं, अगर चाहते तो बड़ी ही आसानी से इस मौके पर एक राजनीतिज्ञ के साथ-साथ, इतिहासकार की भूमिका भी अच्छे तरीके से निभा सकते थे.
प्रणब मुखर्जी के पास था ऐतिहासिक मौका
एक राजनेता के तौर पर प्रणब मुखर्जी की एक बेहद विशिष्ट पहचान बनी हुई है, जो उनके बेहद उम्दा राजनीतिक जीवन की सफलताओं के कारण ही उन्हें हासिल है, अपने राजनीतिक करियर में प्रणब मुखर्जी सफलता के शिखर तक पहुंचे हैं, अगर वे चाहते तो इस ऐतिसाहिक मौके पर न सिर्फ मंच पर छा जाते बल्कि एक यादगार संबोधन भी देते, जो उनके लिए ज़रा भी मुश्किल नहीं था.
प्रणब मुखर्जी के पास पांच दशक से भी ज्यादा का राजनीतिक अनुभव है और इन 50 सालों में देश की राजनीतिक और सामाजिक पेचीदगियों को जिस तरह से उन्होंने जाना-समझा है, उनकी जो सोच विकसित हुई है....उसको ध्यान में रखते हुए हम ये पूरे विश्वास के साथ कह सकते हैं कि अगर डॉ. मुखर्जी चाहते तो आरएसएस के इस सघन तीन साल के कार्यकम (जिसे ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप-ओटीसी) का पासिंग आउट परेड भी कहा जाता है और जिसके प्रतिबद्ध सैनिकों के आगे चलकर आरएसएस के कर्तव्यनिष्ठ सदस्य बनने की पूरी उम्मीद है, वहां प्रणब मुखर्जी के भाषण का एक बिल्कुल ही अलग मतलब निकलकर सामने आना चाहिए था.
ठीक उसी तरह से समकालीन राजनीति और इतिहास को लेकर उनकी जो अध्ययनशील और विद्वतापूर्ण समझदारी है, वो राजनीति के माहिर उन खिलाड़ियों को जरूर चौकन्ना करने का काम करता जो अपना मतलब साधने के लिए देश को तोड़ने और और बांटने वाली राजनीति कर रहे हैं.
सावधान और चौकन्ने नजर आए पूर्व राष्ट्रपति
लेकिन हमें ये अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मुखर्जी दोनों ही भूमिका में बुरी तरह से फेल हुए हैं. एक राजनेता के तौर पर वे न सिर्फ बहुत ही ज्यादा सावधान नज़र आए बल्कि अपने आसपास के माहौल के कारण चौकन्ने भी. उन्होंने जो कुछ भी वहां कहा..बस वही कहा. यानी उनकी बातों में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसपर बाद में विचार-विमर्श किया जा सके या किसी तरह का चिंतन.
हमें उनके राजनीतिक करियर के रिकॉर्ड पर भी एक नज़र डालना चाहिए, जिसे देखकर हम ये आसानी से समझ सकते हैं कि संघ के इस कार्यक्रम में उनका भाषण या यूं कहे कि प्रदर्शन अस्पष्ट क्यों था. क्यों उनका भाषण संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषण का दोहराव या पुनरावृत्ति भर बन के रह गया, जिसमें भारत के सम्मलित स्वभाव और सबको साथ लेकर चलने की सोच के बारे में कहा गया. कांग्रेस पार्टी के नेता के रूप में मुखर्जी हमेशा से बीजेपी-आरएसएस पर हमला करने वाले सबसे मुखर नेताओं के रूप में जाने जाते रहे हैं, उन्होंने ऐसे कई प्रस्तावों का गठन किया था जिनमें हिंदुत्ववादी ताकतों को भारत की अखंडता का विरोधी बताया गया.

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